शिव के 108 नाम

परम ज्ञान के उदित होने पर सम्पूर्ण प्रपंच का बाध् होकर परम मंगलमय जो परमात्मा बचता है उसे हीं शिव कहते हैं। शिव का अर्थ है अत्यन्त कल्याण स्वरूप वाला। सभी नामों में इसे प्रथम गिना गया है क्योंकि यह परमात्मा के स्वरूप का स्पष्टतया भान करा देता है। ऐसे तो भगवान के जितने नाम हैं सभी मंगलकारी है पिफर भी सभी नामों में यह सर्वश्रेष्ठ नाम है। शिवरहस्य इस सम्बन्ध् में बड़ी सुन्दर बात बतलाता है–

सर्वाणिशिवनामानि मोक्षदान्येव सर्वदा।
तेष्वप्युत्तमं नाम शिवेति ब्रह्रासंज्ञितम्।।
शिवेति नाम विमलं येनोच्चारितमादरात्।
तेन भूयो न संसारसागर: समवाप्यते।।

शिव के जितने नाम हैं वे सदा हीं मोक्ष दायक हैं इसमें कोई संशय नहीं है। उन सारे नामों में तुरीय अवस्था को बताने वाला, ब्रह्रा स्वरूप को दर्शाने वाला यह शिव नाम है। जिसने भी आदरपूर्वक इस नाम का उच्चारण किया वह फिर इस संसारसागर में नहीं आता है। ‘शिव’ ये दो वर्ण परम पद की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाले परम पुनीत पंख हैं। संसार रूपी समुद्र को मर्यादा में रखने के लिए ये दोनों तट के समान है। आत्म ज्ञान को पैदा करने के लिए ये अंकुर के समान हैं। वेद के रहस्य को बताने वाले ये गुप्तचर हैं। ज्यादा क्या, संसार वृक्ष के बीज को पीस डालने के लिए ये चक्की के दो पाट हैं। आचार्य भास्कर की सूत्तिफ श्रवणीय है–

शिवेति द्वौ वर्णौ परपदपतद्धंसगुरुतौ तटौ संसाराब्धेः स्वविषयकबोधाङ्कुरदले।
श्रुतेरन्तर्गोपायिततररहस्यब्रुवचरौघरट्टग्रावाणौभवविटपिबीजौघदलने।।

शिकार और वकार के सहारे हीं मोक्ष का सारा अनुष्ठान संपन्न होता है इसलिए इसे पंख कहा जाता है। संसार का प्रारंभ और अंत दोनों शिव से हीं सम्पन्न होता है। शिव को न जानने से संसार और शिव को जानने से संसार का अंत इसलिए ‘शि’ और ‘व’ को तट बतलाया है। आत्मज्ञानरूपी बीज के अंकुरित होने पर सारा जगत् शिवमय हो जाता है। वेद ने जिस परम तत्व को अपने अंतर में छुपा रखा है उसे प्रकट करने वाले ‘शि’ और ‘व’ हैं इसलिए इन्हें गुप्तचर कहा गया है। गुप्तचर का कार्य रहस्य को प्रकट करना है। अनंत वासनाओं सहित अज्ञान को पीस कर पिनाकी नष्ट कर डालते हैं इसलिए इन्हें जाँत के दो पाट कहा जाता है।
शिव यह नाम, वेद के मध्य में पठित है इसलिए इसे वेद का हृदय भी कहा जाता है। ॠग्, यजु:, साम इन तीनों वेदों के मध्य में है यजु: और यजुवे‍र्द में है शतरूद्रीय, शतरूद्रीय में है नम: सोमाय अनुवाक् और उस अनुवाक् में है शिवाय नम:। शिवाय नम: यह पञ्चाक्षरी मन्त्र है और इसमें है शिव शब्द। अतएव यह सम्पूर्ण वेद का हृदय है और यही तारक मंत्र है। आचार्य भास्कर इस नाम की व्याख्या इस प्रकार करते हैं–

प्रकृत्त्या नैर्मल्यादमलगुणयोगादपि शमा–
ज्जगत्याधारत्वाद्भजदमृतदानाच्च भवत:।
बलादिच्छाश्क्ते: प्रथितपुरि भद्रश्रव इति
प्रतीतस्त्वं लिंगे त्रिपुरहर! तस्मादसि शिव:।।

सम्पूर्ण मलों से रहित होने के कारण, कल्याण गुण वाले होने से , अत्यन्त शान्त होने से, प्रपंच के अधिष्ठान होने से, भजने वाले को सुधा प्रदान करने से और इच्छाशक्ति के आश्रय होने से, आप स्वभाव से हीं शिव हैं। वशि को उल्टा कर देने पर शिव हो जाता है।

 

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