खट्वांगी

सामान्य साधक को यह समझ में ही नहीं आता है कि भगवान् अपने हाथ में खाट का एक ‘पाया’ रखकर ‘खट्वागी’ कहलाने का शौक क्यों रखते हैं। खाट के यदि चार पाये रहते तब तो यह समझा जा सकता है कि चलो आगे दूसरे खाट का निर्माण होगा और वह सोने, आराम करने के काम आयेगा। पर एक पाये से तो कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है। यह कभी अस्त्र या शस्त्र के रूप में भी शास्त्र में नहीं जाना जाता है। शास्त्र के रूप में तो त्रिशूल धारण कर ही रखा है, वह भी अमोघ है कभी विफल नहीं जाता है। हाँ! एक प्रयोजन नजर आता है कि जप करते समय आराम के लिए उस पर हाथ रखा जा सकता है। पर वह भी कभी–कभी सदा नहीं, अत: सतत खट्वांग धारण के पीछे रहस्य क्या है।
भास्करराय की ‘नाम’ व्याख्या इस रहस्य से पर्दा उठाती है–जिस समय ब्रह्मा ने झूठ बोला, उस समय आपने उसका पाँचवा सिर काट लिया, उससे ब्रह्मा की हत्या नहीं हुई, तो हिंसाजन्य पाप भी नहीं लगा, फिर भी आपने दण्ड स्वरूप; दण्ड का आधा टुकड़ा अपने हाथ में पकड़कर, लोगों को शिक्षा प्रदान की कि अपराध होने पर प्रायश्चित अवश्य करना चाहिए। अध्यात्म में खाट का पाया–शुद्धसत्व का प्रतीक है। आप शुद्धसत्वप्रवर्तक शक्तियों को धारण करने वाले हैं इसलिये खट्वांगी कहलाते हैं।
भगवान् सर्वसमर्थ है फिर भी लोक शिक्षार्थ ब्रह्महत्या अपनोदन के लिए शास्त्रीय विधान का आदर करते हैं, जैसा कि शतरूद्रसंहिता कहती है–

ब्रह्महत्यापनोदाय व्रतं लोकय दर्शय।
चर त्वं सततं भिक्षां कपालव्रतमाश्रित:।।

अर्थात् कपाल और खट्वांग धारण कर, सतत भिक्षाटन से ब्रह्महत्या नष्ट हो जायेगी। महाभारत का शांतिपर्व भी प्रमाण है इसमें–

कपालपाणि: खट्वांगी ब्रह्मचारी सदोत्थित:।
पूणैर्द्वादशभिर्वर्षै र्ब्रह्महा प्रतिमुच्यते।।

अर्थात् कपालपाणि होकर खट्वांगी बनकर, ब्रह्मचर्य पूर्वक बारह वर्ष व्रत का पालन करने से ब्रह्महत्या दूर हो जाती है।
स्वामी काशिकानन्द गिरि जी महाराज ने महिम्निस्त्रोत के स्पन्दवार्तिक में खट्वांग का अर्थ ‘पुरुषार्थ’ बतलाया है–

कांक्ष्यमाणांगहेतोरप्यर्थोSयं हि लभ्यते।
खट्यते पुरूषार्थत्वात् कांक्ष्यते पुरूषैरिति।।

अन्य अध्यात्मचिंतक खट्वांग का अर्थ ‘तुरीय अवस्था’ कहते हैं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय, इन्हीं चार अवस्थाओं में यह विश्व स्थित है। ये चारों एक खाट के पाये जैसे हैं, जिस पर खाट टिका रहता है, यह जगत् हीं खाट है। उसमें तीनों अवस्थाओं से अतीत तुरीय अवस्था में शिव स्थित रहते हैं। अर्थात् खाट का एक पाया धारण करते है, इसलिए उन्हें खट्वांगी कहा जाता है।
आचार्य मधुसूदन स्वामी ने आगम के आधार पर, प्रधान यानि प्रकृति को ही खट्वांग बतलाया है अपनी महिम्नस्त्रोत की व्याख्या में। प्रकृति को धारण महेश्वर ही करते हैं अतएव वह खट्वांगी कहलाते हैं।
श्री स्वयंप्रकाशयति के अनुसार खाट में लगा होने पर ही पाया, पाया कहा जाता है। जैसे हीं उससे अलग हुआ तो वह कहने भर को पाया है। ऐसे हीं जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तो पाये हैं, पर तुरीय तो कहने भर को पाया है, क्योंकि वह खाट में नहीं, वह तो शिव के हाथ में सुशोभित है। तुरीय अवस्था हीं शैवी अवस्था है। वस्तुत: खट्वांग शिव से अभिन्न है जैसा कि श्रुति कहती है–
शिवं चतुर्थ मन्यन्ते....(माण्डूO 7)
परम पुरुषार्थ भी आकांक्ष्य होने से खट्वांग कहलता है उसे धारण करने से शिव खट्वांगी कहे जाते हैं। इस खट्वांगी से भगवान् शंकराचार्य बड़ी सुन्दर प्रार्थना करते हैं–

या: स्वस्यैकांशपातादतिबहलगलद्र्क्तवक्त्रं प्रणुन्न–
प्राणं प्राक्रोशयन्प्रा्ङ निजमचलवरं चालयन्तं दशास्यम्।
पादांगल्यो दिशन्तु द्रुतमयुगदृश: कल्मषप्लोषकल्या:,
कल्याणं फुल्लमाल्यप्रकरविलसिता व: प्रण्द्धाहिवल्ल्य:।।

अर्थात् भगवान् शंकर की वे चरणों की अंगुलियाँ जो पहिले अर्थात् जिससमय रावण तपस्या कर रहा था, भगवान् के आशीर्वाद को पाने के लिए दशानन रावण अपने एक–एक शिर को पूजा के उपहाररूप में समर्पण करने लग गया, इस प्रकार शिरच्छेदन से निकलते हुए रक्त से संसक्त हो गया था, प्राण भी उसके प्रयाण कर रहे थे, दयालु भगवान् ने शिरच्छेदन से उसको रोका, और उसकी भ्क्ति से प्रसन्न होकर, उसे वरदान दिया। इसी वरदान से गर्वित होकर, पुन: वह एक दिन अपने बल की परीक्षा के लिए, भगवान् शंकर के अपने निवास स्थान कैलास पर्वत को ही उठाने लगा, इसी बीच में भगवान् ने अपने चरण के एक अंश अंगूठे से हीं, उस पर्वत को स्थिर किया, तो इस दृश्य से, जो पादांगलियाँ, क्रन्दन करने लगी, या रावण के इस प्रकार के दु:साहस को देखकर उसको शाप देने लगी थीं, सर्वविध पाप को दूर करने से स्वच्छ, प्रफुल्लित मालाओं से सुशोभित, सर्परूपी लताओं से वेष्टित ‘वे’(विषमदृष्टि) भगवान् की, पदांगुलियाँ, जल्द हीं आप लोगों का कल्याण करें। परमपुरुषार्थ प्राप्ति हीं खट्वांगी की उपासना है।

ों से रक्षा करे।

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