विष्णुवल्लभ

यह नाम भी रामेश्वर की तरह हीं है। विष्णु के वल्लभ यानि प्रिय भगवान् सदाशिव अथवा विष्णु हैं प्रिय जिनके ऐसे शंकर। विष्णु एवं शंकर की प्रियता का क्या वर्णन किया जाए, जहाँ दोनों ही अभिन्न रूप हो जाते हैं। पुराणों में विष्णु शिव की प्रेम कथाएँ विस्तृत रूप से बिखरी पड़ी है। भगवान् शंकर के बिना विष्णु नहीं रह पाते हैं और विष्णु के बिना शंकर का रहना मुश्किल लगता है। इतना प्रगाढ़ प्रेम है कि योगीराज शंकर विवाह की मनाही कर देते हैं देवताओं के कहने पर, पर विष्णु भगवान् के आग्रह करने पर वे तुरंत मान जाते हैं। कहीं कहीं पर चिंतकों ने तो यहाँ तक चिंतन दिया है कि भगवान् विष्णु शिव का चिंतन करते हैं और शिव विष्णु का चिंतन करते हैं जैसा कि रामचरित मानस में सती के प्रसंग से ज्ञात होता है।
भगवान् शंकर भी कहते हैं– विष्णु मेरे हृदय हैं और मैं विष्णु का हृदय हूँ। जैसे हृदय के बिना शरीर की कोई सत्ता नहीं है वैसे हीं एक दूसरे के बिना दूसरे की सत्ता नहीं है क्योंकि भगवान् शिव हीं अपने अर्धांग से स्वयं विष्णु बन गए हैं और विष्णु को अपने बाएँ भाग में स्वयं धारण भी करते हैं।
विष्णु के हृदय में सदाशिव का नित्य निवास है। एक बार देवता कैलाश पर्वत पर पहुँचे, लेकिन वहाँ भगवान शंकर दिखलाई नहीं पड़े तब देवता लोग लौटकर भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और कहने लगे कि पता नहीं परमशिव कहाँ गायब हो गये हैं। हमलोगों को उनका पता नहीं चल पा रहा है। तब कमल नयन ने उनसे कहा कि भगवान् और कहीं नहीं, हमारे हृदय में विराजमान हैं और वहीं से निकाल कर देवताओं को सदाशिव के दर्शन करा दिए जैसा कि वामन पुराण कहता है–

तमूचुर्नैव पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम्।
सत्यं वद सुरेशान! महेशान: क्व तिष्ठति।।
ततोSव्ययात्मा स हरि: स्वहृत्पंगजशायिनम्।
दर्शयामास देवानां मुरारिर्लिंगमैश्वरम्।।

विष्णु ने स्वयं ही भगवान् शंकर से दृढ़ भक्ति का वरदान मांगा है। सौरपुराण के अनुसार–

भगवन् देवदेवेश परमात्मन् शिवाव्यय।
निश्चला त्वयि मे भक्ति: भवत्विति वरो मम।।

हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर उपवास करते हुए कृष्ण ने बारह वर्ष तक तपस्या की, तब सदाशिव का उन्हें दर्शन हुआ। नम: शिवाय के जप स्वरूप शंकर ने उन्हें संतान का आशीर्वाद दिया।
भगवान् शिव से भगवान् विष्णु को इतना प्रेम है कि शिव के लिए वे हर कार्य करने के लिए तैयार हो जाते है। जब त्रिपुरासुर को मारने का कार्यक्रम बना तब पृथ्वी रथ बनी, लेकिन देवताओं से वह संभली नहीं, तब विष्णु वृषभ (साँड़) बनकर स्वयं पृथ्वीरूपी रथ के जुए में जा लगे। भगवान् शंकर के लिए अमोघ बाण चाहिए था, जिससे त्रिपुरासुर मारा जा सके, तब विष्णु बाण बनकर वृषभ वाहन के हाथ में आ गए।
शिवलिंग के आरंभ का पता लगाने के लिए, सुअर बन गए। महादेव के आग्रह पर मोहिनी रूप दिखाकर स्वयं भार्या बन बैठे। जब भगवान शंकर नृत्य की इच्छा अभिव्यक्त करते हैं, तब मुरारी हीं मृदंग बजाते हैं। हासविलासरास रस के रसिक भगवान् रासबिहारी सखी बन जाते हैं। कमल चढ़ाते–चढ़ाते स्वयं अपनी कोमल काया का कमनीय अंग नयन तक शिवचरणों में अर्पित कर देते हैं। अत: विष्णु की प्रियता का क्या बखान किया जाए। आचार्य शंकर के शब्दों में–

बाणत्वं वृषभत्वमर्धवपुषा भार्यात्वमार्यापते घोणित्वं
घोणित्वं सखिता मृदंगवहताचेत्यादिरूपंदधौ।
त्वत्पादेनयनार्पणंचकृतवांस्त्वद्देहभागोहरि:
पूज्यात्पूज्यतर:सएवहिनचेत्कोवातदन्योSधिक:।।

भास्करराय तो कहते हैं कि तपस्या करते हुए विष्णु को, चरण नख किरणों से समुत्पन्न सुदर्शन चक्र प्रदान कर उन्हें अपना आधा शरीर प्रदान कर दिया इसलिए आप विष्णुवल्लभ हैं–

वितरन् हरये तपस्यते पदरेखाजनितं सुदर्शनम्।
वपुरर्धमपि प्रियाय ते प्रथितस्त्वं भुवि विष्णुबल्लभ:।।

अध्यात्म में विष्णु को उपादान कारण स्वीकार किया गया है और शक्ति है निमिक्त कारण, शिव है इन दोनों का अधिष्ठान अर्थात् अभिन्न निमित्तोपादान कारण। अधिष्ठान को उपादान कारण अत्यधिक प्रेम करेगा हीं क्योंकि अधिष्ठान के बिना उसकी सत्ता नहीं है। उपादान की आत्मा हीं अधिष्ठान है।
विष्णु और शिव में इतनी अभिन्नता है कि चिंतन करते करते विष्णु काले और शिव गौर वर्ण के हो गये। विष्णु का सत्त्वगुण शिव में आ गया और शिव का तमोगुण विष्णु में चला गया इसलिए शिव सदा ध्यान में मग्न रहते हैं और विष्णु आराम फरमाते हैं।
जगत् की विर्वत कारणता को पहचानना हीं विष्णुवल्लभ की उपासना है।

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