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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

कपाली

अपात्रा को भी सुपात्र बनाकर धारण करने के कारण शिव को कपाली कहते हैं। जिनके कर कमल में कपाल का ही पात्र है, वे ही कमनीयकांत कपाली है। संसारी अपने सत्पात्रता प्रदर्शित करने के लिये सुन्दर से सुन्दर पात्रा धारण करता है किन्तु शिव को किसी के समक्ष अपनी पात्रता के परिचय की आवश्यकता ही नहीं। वे तो कुपात्र होकर भी सुपात्र है और संसारी सुपात्र होकर भी कुपात्र बन जाता है। इस कपाल को धारण कर भगवान् भोलेनाथ भिक्षाटन करते हैं और संसारियों को संदेश देते है कि अपराध का क्या परिणाम होता है। ब्रह्मा के बीभत्स कृत्य का भगवान् ने पञ्चम शिर का छेदन ही दण्ड मान और उनका पाँचवा सिर काट लिया। हर तो हर दृष्टि से समर्थ है, फिर भी भैरव रूप से कपाल मोचन तीर्थ में तप करते हुए इस अकार्य का प्रायश्चित किया।
एक बार बह्मा को गर्व हो गया कि मैं ही परमेश्वर हूँ और कोई दूसरा इस ब्रह्माण्ड का अधीश्वर नहीं है–उस गर्व को खर्व करने के लिये ही कपाली ने ब्रह्मा का पाँचवा कपाल काट लिया और उसे अपना भोजनपात्र बना डाला। वे कपाली होकर भी सबसे बलशाली हो गये। अविवेकादि सुरविरोधी गुणों का नाश करना ही ‘कपाली’ नाम का आध्यात्मिक रहस्य है।
भास्करराय के अनुसार–

कमलभवकरोटिव्रातमालाधरत्त्वात् तदधिकबलशाली भासि कङ्कालनाथ:।
परशिव करवीरक्षेत्रमध्यस्थलिङ्गे निवससि सुरवंद्यो नामतस्त्वं कपाली।।

हे परमशिव! आप बह्मा के कपाल समूह से बनी माला धारण करने के कारण कंकालनाथ होते हुए भी ब्रह्मा से अधिक बलशाली प्रतीत होते हैं। करवीर क्षेत्र में स्थित लिङ्ग में आप कपालीश्वर नाम से प्रतिष्ठत हैं और देवताओं द्वारा वन्दनीय आप नाम मात्रा को कपाली हैं। वस्तुत: भगवान नाममात्रा को ही कपाली हैं और नाम भी नाम मात्रा को ही है। भगवान का करकपाल पाँच छिद्रो वाला होते हुए भी मोक्षरस से परिपूर्ण है जिसका वर्णन भट्ट जगद्धर ने अपने कुसमाञ्जलि में किया है–

भालग्निकीलकलिताखिलरन्ध्रभागं
भर्गस्य वो दिशतु शर्म शिर:कपालम्।
यत्कालवह्निवपुष: पचत: प्रभूत
भूतव्रजं व्रजति तस्य महानसत्त्वम्।।

जो कालाग्निरूद्र रूप से अनेक लोकसमूहों को पकाते हुए रूद्र की पाकशाला बन जाता है और जिसके सारे छिद्र शिव के शिर की ज्वालाओं से भर जाता है, भर्ग के पास स्थित शिर:कपाल आपको मोक्षलक्ष्मी प्रदान करे।
विचार से तो ब्रह्माण्ड ही कपाल है, इन दोनों के मध्य खड़ा होकर, शिव ने इसे जोड़ दिया है और इसके स्वयं अधिपति बन गये हैं इसलिए उन्हें कपाली कहते हैं। उपनिषद् के अनुसार अन्न और अत्ता ही कपाल है और दोनों का अधीश्वर होने के कारण उन्हें कपाली कहा जाता है।
स्वसुता संध्या में सुरति की प्रवृति देखकर भगवान भर्ग ने ब्रह्मा का सिर काटकर, उसे खप्पर की तरह प्रयोग कर लिया इसलिए शिव कपाली कहलाने लगे। जिसका वर्णन महिम्नस्तोत्र में आया है। भगवान के हाथ का कपाल लबालब अमृत से भरा हुआ है इसलिए वह कहने को कपाल है, है तो वस्तुत: सुधा कलश।
भगवती सती के प्रत्येक जन्म के कपालों की माला पहनने के कारण शिव कपाली हैं। इस शरीर में चेतन रूप से, कपाल छिद्र से प्रवेश करने के कारण हीं शिव को कपाली कहा जाता है।
एकाक्षरी कोष के अनुसार ‘क’ का अर्थ ब्रह्मा होता है। भगवान् स्त्र्ष्टा के भी पालक हैं इसलिए कपाली कहलाते हैं। ‘क’ का एक अर्थ वायु भी होता है। स्वयं प्राण बनकर हमारा पोषण करने के कारण शंकर कपाली कहलाते हैं। ‘क’ का अन्य अर्थ यमराज भी है। यम का शासन करने के कारण भी शिव कपाली कहे जाते हैं। मेदनीकोष के अनुसार ‘क’ का एक अर्थ अग्नि भी होता है। स्वयं जठराग्नि बनकर अन्न पाचन के द्वारा हमारा पालन शिव हीं करते हैं इसलिए कपाली हैं। ‘क’ का अर्थ यदि जल लिया जाये तो कपाली जल बनकर हमें जीवन देते हैं।
‘क’ का एक अर्थ आत्मा भी होता है अतएव शिव सबकी आत्मा होकर सबका पालन करते हैं इसलिए कपाली नाम से कहे जाते हैं। ‘क’ का मतलब सूर्य भी होता है। स्वयं सूर्यमूर्ति बनकर इस जगत् को जीवन देने के कारण शंकर कपाली कहलाते हैं।


 
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  कार्यक्रम
 
  शिव कथा
    मकर संक्राति
    शिव नाम प्रवचन
    महा शिव रात्रि
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संर्पक

श्री वेदनाथ महादेव मंदिर
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  प्रवचन
 
    प्रवचन 1
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  प्रवचन 4
 

 

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