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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

कवची

आसुरी शक्तियों से लोहा लेते समय शिव एक योद्धा का रूप धारण कर लेते हैं। कवच धारण करने के कारण उनको कवची कहा जाता है। वेद इस कवची रूप को नमन करता है– कवचिने च नमो वर्मिणे च(शतरूद्रीयसंहिता )। ‘वर्म’ और ‘कवच’ धारण करने वाले को मेरा नमस्कार। वर्म का हीं उर्दू में ‘बख्तर’ हो गया। सैनिकों के विशेष प्रकार के बस्तर को भी बख्तर कहा जाता है। जिस प्रकार कवच सैनिक का सौन्दर्य वधर्न करता है, उसी प्रकार नामरूप कवच के द्वारा शिव की अनंत शक्तियाँ खिल उठती है और उनका सौन्दर्य प्रकट हो जाता है। विचारक तो कवची नाम के द्वारा सोपाधिक ब्रह्म को समझते हैं। नाम कल्पलता की व्याख्या आलवाल इस नाम को ऐसे समझाती है–

वर्माभावे परशरनयनै: स्पृश्यो दृश्यो भवति हि सकल:।
स्वातम्त्र्येण द्वयमपि तिरयन् दुष्प्रापत्त्वात् प्रभवसि कवची।।

अर्थात् कवच न होने पर सभी लोग अन्यों के वाणों से स्पृश्य और अन्यों के नयनों से दृश्य बन जाते हैं। किन्तु आपका स्वरूप अत्यन्त दुर्लभ होने से आप किसी अन्य सहायता के बिना अन्यों के बाणों एवं नेत्रों को अपने से संबंधित नहीं होने देते अत: आप कवची कहे जाते हैं। यहाँ बाण से क्रिया और नेत्र से ज्ञान समझना चाहिए। परमशिव दोनों के हीं अविषय हैं, इसलिए कवची हैं। शिव का अन्य के पराधीन न होना हीं उनकी परम स्वतन्त्रता है।
अध्यात्मवेत्ता तो शरीरद्वय को हीं वर्म और कवच स्वीकार करते हैं। सूक्ष्म देह वर्म और स्थूल देह कवच है। इन्हीं दोनों से वह कारण परमेश्वर आवेष्टित है। अथवा नामरूप हीं वर्म एवं कवच है इन्हीं से वह शिव अपने को छुपा लेता है। नामरूपात्मक कवच को हटाकर कवची को पकड़ना हीं कवची की उपासना है।



 
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