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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

वृषांक

कैलाश पर्वत पर भगवान् शंकर ध्यानस्थ मुद्रा में बैठे हुए थे। उत्थित होने पर भगवती ने प्रश्न पूछा, कि आप वृषभ का चिह्न अपने ध्वजा में क्यों धारण करते हैं। भगवान् शंकर ने एक सुन्दर सा इतिहास सुना दिया कि मैं एक बार हिमालय की उपत्यका में तपलीन था। वहाँ पर गायों के झुण्ड, इधर–उधर से आकर, उस तपस्थली को बार–बार गंदा कर रहे थे। उनके इस दुराचरण के कारण मुझे गुस्सा आ गया। तब मैंने उन्हें बहुत डाँटा। उसी समय एक वृषभ ने बड़ी हीं शांतिपूर्वक प्रर्थाना करके मुझे शांत कर दिया। उसके इस व्यवहार से मैं बहुत प्रसन्न हुआ और उसको मैने अपना वाहन बना लिया और उसे हीं अपना ध्वज चिह्न भी बना लिया। पताका में नन्दी का पवित् चिह्न होने के कारण शंकर को वृषांक कहा जाता है।
दूसरी कथा के अनुसार सुरभि गौऊ के बछड़े के मुख से, भगवान् के शरीर पर फेन गिर जाने के कारण, रूद्र रूष्ट हो गये। ब्रह्मा ने उन्हें शांत किया और उसी वृषभ को वाहन के लिए अर्पित कर दिया। तब से भगवान् ने उस वृषभ को हीं अपना चिह्न बना लिया। आलवाल तो इस नाम की व्याख्या इस तरह करती हैं–

त्वं गवामनयत: कुपितोSपि प्रार्थितोSसि सुकृतेन वृषेण।
तेन त्द्ध्वजरथो वृषशैले विश्रुतोSस्यभिधयाSपि वृषाङ्क:।।

अर्थात् हे भगवन्! गौओं के अमर्यादित व्यवहार से कुपित होने पर धर्मरूप वृषभ द्वारा आप प्रार्थित हुए। अत: आप उससे चिह्नित पताका वाले रथ पर चलते हैं और वृषशैल में आपका वृषांक लिङ्ग है। इसलिए आप वृषांक कहे जाते हैं। विचारक तो वृषभ को धर्मरूप हीं स्वीकार करते हैं। सभी सुखों के वर्षण करने कारण धर्म को वृषभ कहा जाता है। आप धर्म चिह्न के द्वारा हीं पहचाने जाते हैं। अपने धार्मिक आचार के द्वारा, दूसरों को धर्म प्रेरित करना भगवान् वृषांक की उपासना है।



 
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