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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

वृषभारूढ

नन्दी साँढ को वाहन के रूप में स्वीकार करने के कारण शिव को वृषभारूढ कहा जाता है। जैसे भगवान् विष्णु का वाहन गरूड़ है, ब्रह्मा का वाहन हंस है, देवी का वाहन सिंह है, इन्द्र का वाहन ऐरावत है, कुबेर का वाहन मनुष्य है, वैसे हीं भगवान् वामदेव का वाहन वृषभ है।
वृषभ का एक अर्थ–श्रेष्ठ भी होता है। श्रेष्ठ वाहन पर सवारी करने के कारण शिव को वृषभारूढ कहा जाता है। जीवन में धर्म रूपी वृषभ हीं सबसे श्रेष्ठ है। जिससे लोक और परलोक दोनों में कल्याण होता है। आलवाल वृषभारूढ की व्याख्या आध्यात्मिक ढंग से करती हैं–

नन्द्यारोहात् त्रैपुरदाहे हरिणा पृष्ठे
वेदाश्वानां गोवृषरूपै: समुपात्तत्त्वात्।
धर्मज्ञानैश्वर्यविरागेषु निरूढत्वाद्
विख्यातोSसि त्वं सुरवृन्दे वृषभारूढ:।।

अर्थात् आप नन्दी की सवारी करते हैं और त्रिपुरदहन के समय पर विष्णु के द्वारा वेदरूप अश्वों का वृषभरूप से धारण करने पर आप परंपरया वृषभ रूप विष्णु पर आरूढ हुए थे, इसलिए वृषभारूढ कहे जाते है। आप सतत धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य पर दृढ रहते हैं अतएव वृषभारूढ कहे जाते हैं। भगवान् व्यास ने भगवान् शंकर से वृष शब्द को कई अर्थों में संपृक्त कर दिया है–

कपर्दिनं वृषावर्तं वृषनाभं वृषध्वजम्। वृषदर्पं वृषपतिं वृषश्रृंगं वृषर्षभम्।
वृषांकं वृषभोदारं वृषभं वृषभेक्षणम्। वृषायुधं वृषशरं वृषभूतं वृषेश्वरम्।।

भगवान् मनु ने भी मनुस्मृति में वृषभ को धर्मरूप हीं स्वीकार किया है– वृषो हि भगवान् धर्म्:। शंकर केवल धर्म चिह्न लेकर नहीं चलते बल्कि जीवन में, धर्म का आचरण भी करते हैं लोकशिक्षा के लिए। अध्यात्म में तो विवेक, वैराग्य, शमादि और मुमुक्षारूप चारपादों वाला शुद्ध अंत: करण हीं वृषभ है, जो शिव को अपने ऊपर धारण करता है। इसलिए शिव वृषभारूढ कहे जाते हैं।
धर्म पालन के लिए कष्ट सहना भी वृषभारूढ शब्द के द्वारा वनित होता है। जैसे वृषभ को वश में करना अत्यन्त कठिन होता है क्योंकि वह मनमाना चलता है वैसे हीं अपने मन को भी वश में करना अत्यन्त दुष्कर है क्योंकि धर्म विरूद्ध बाते हीं इसे अच्छी लगती है। भगवान् शंकर इस धर्म रक्षा के लिए बड़ी सी बड़ी विपत्ति को भी हँसते–हँसते सह लेते हैं जिसका वर्णन शिवानन्दलहरी करती है–

नालं वा परमोपकारकमिदं त्वेकं पशूनां पते,
पश्यन् कुक्षिगतांराचरगणान् बाह्यस्थितान् रक्षितुम्।
सर्वामर्त्यपलायनौषधिमतिज्वालाकरं भीकरं,
निक्षिप्तं गरलं गले न गिलितं नोद्गीर्णमेव त्वया।।

अर्थात् हे पशुपते! समुद्र मंथन से जब पहली बार गरल–विष निकला, तो इसे आपने संसार के लिए अत्यन्त हितकर नहीं समझा, अत: उदरस्थ चराचर जगत् तथा बाह्य जगत् की, रक्षा के लिए तथा देवताओं के लिए अहितकर ज्वाला स्वरूप अर्थात् संसार को भी भस्म कर देने वाले अति भयानक इस गरल को अपने गले में रख लिया, न तो अभी तक आपने उसे निगला और न ही उद्वमन हीं किया।
धर्म प्रदर्शन के बजाए, जीवन का अंग हो, यही वृषभारूढ की उपासना है।



 
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