मुख्य पेज   |    संर्पक    |   मिडीया      |    English
ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय
ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिवभक्ति की प्रंशसा

शिवभक्ति की प्रंशसा

श्री गणेश जी की मैं वन्दना करता हूं ताकि मेरा मनोरथ निर्विघ्न पूर्ण हो। मैं शिव-पार्वती की गोद में खेलते कार्तिक स्वामी की उपासना करता हूं। वासना-अंधकार का
निवारण करने वाले शिवभक्तों की चरणधूलि को मेरा सदा प्रणाम है। श्रीपति ,ब्रह्मा ,सूर्य, स्कन्द, इन्द्रादि देवों की और उपमन्यु आदि मुनियों की मैं हमेशा वन्दना करता हूं।
नैमिषारण्य में मुनियों ने अठारहों पुराणों के जानकार सूत जी से कहा—हे सूत जी! आप महामति हैं, व्यासजी के शिष्य हैं, सभी पुराणों को जानते हैं। हम अपने संदेह को मिटाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात आपसे पूछ्ते हैं। वेद, आगम, मन्त्र, कर्मबोधक-वाक्य और महावाक्य इनका चरम तात्पर्य क्या है? संसरण का कारण क्या है? वेदान्त का विचार कर लेने पर और उसका अर्थ समझ लेने पर भी कर्म-बंधन चलता ही क्यों रहता है, छूटता क्यों नहीं? यह सब आप विस्तार से बताइये। श्रेष्ठ मुनियों ने जब यह पूछा तो सर्वज्ञ सूत जी ने उत्तर देने से पहले गुरुमूर्ति शंकर जी को, गणेश जी को, देवी सरस्वती को, स्कंद को, नंदी को, महाविष्णु को, ब्रह्मा को, हेमवती उमा को, अपने गुरु श्री वेदव्यास को, अगस्त्य को, पतंजलि को, दधीचि को, परशुराम को, जैमिनि को, गौतम को, भृगु को, उपमन्यु को, शिवभक्त अर्जुन को, महामुनि मार्कण्डेय को, वेदशास्त्रों के अन्य उपदेशकों को, सम्प्रदाय-परंपरा में आये आचार्यां को तथा महानुभाव शिवभक्तों को प्रणाम किया। मन, वाणी व शरीर; तीनों से उन्होंने सबको नमन किया। उक्त प्रश्नों का उत्तर देने के लिये ‘शिवभक्तविलास’ नामक पुराण को सुनना-पढ़ना एवं सुनाना आदि सभी पुण्यप्रद है। भक्तों की कथारूप अमृत से यह आप्लावित है तथा इसमें हमेशा विचित्रता है। सभी लोग इस पुराण का आदर करते हैं। इसके मूल वक्ता शिवभक्तोत्तम एवं श्रीकृष्ण को शिवविद्या देने वाले महामुनि उपमन्यु हैं।

सूत जी बोले—हे श्रेष्ठ मुनियों! आपने जो प्रश्न किया, इसके समाधानार्थ जो आपको खासकर जानने योग्य है वह आपको मैं सुनाता हूँ। कैलास पर्वत पर उपमन्यु मुनि ने जो उपदेश दिया था, जिसे गुरुमुख से मैंने जैसा सुना-समझा है वैसा ही आपको बताता हूँ। वेद, आगम, पुराण तथा सभी मंत्रादि में एक महादेव ही परम प्रतिपाद्य हैं। जैसे लहर आदि का अधिष्ठान समुद्र ही है ऐसे ही अन्वयार्थ कह्ती हुई भी शब्दराशि एकमात्र शशिशेख़र को बिना संकोच के सर्वाधिष्ठान बताती है। वेदों का आरम्भ ओर समापन
ॐ के उच्चारण से होता है। ॐ ईश्वर का निकटतम नाम है। यह जब अपनी शक्ति से ईश्वर का बोध कराता है तो ईश्वर की प्रकृति नामक सामर्थ्य के परिप्रेक्ष्य से ह्टकर नहीं करा पाता। सभी सन्दर्भों को, सापेक्षताओं को छोड़कर ईश्वर का ज्ञान कराने की कोशिश में यह नाम स्वयं उस प्रकति की सीमायें लाँघ नहीं पाता, उसी में मानो लीन हो जाता है। उससे सापेक्ष को बताकर अपनी शक्ति व्यय कर चुकता है। जब यह यों लीन हो जाता तब इससे परे प्रकृति के परिप्रेक्ष्य से रहित जो आत्मा है, वह ॐ से लक्ष्य होता है। वह महेश्वर है। सभी पुराण और आगम उस महेश्वर की स्तुति करते है। ब्रह्मवादी वेदज्ञ सनकादि उसे समझते हैं क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के सम्पर्क से उनके सत्य-संबंधी सब संशय समाप्त हो चुके हैं। जब तक परमात्मानुभव के प्रकाशक गुरु को साक्षात् परमेश्वर न समझ लिया जाये तब तक ये संदेह मिटते नहीं कि जगत् नित्य है या अनित्य, शिव से जीव अलग है या नहीं, ज्ञान से मोक्ष होता है या नहीं, शरीर आत्मा है या नहीं इत्यादि? शास्त्रों का निर्णय है कि गुरु तो शिव से भी ज्यादा प्रशंसनीय है। जो व्यक्ति गुरु को मनुष्यमात्र समझता है उसका संसरण समाप्त नहीं होता। जाति, वर्ण, आश्रम आदि का उसे अभिमान बना ही रहता है। वह प्रकृति के वशवर्ती होने से अनित्य वस्तुओं को ही नित्य मानता रहता है। सद्रूप आत्मा के बारे में जो असंभावना और विपरीत-भावना सैकड़ों वेदान्त-वाक्यों से भी हटती नहीं, उसे हटाने के लिए ब्राह्मण लोग दीर्घकाल तक कोशिश करते हैं। (सद्रूप आत्मा होना संभव नहीं-यह असंभावना है और आत्मा को सत् से अन्य कुछ भी समझना विपरीत-भावना है।) अविवेकी लोग उन अनिष्ट भावनाओं को हटाने के कई उपाय बताते हैं। आत्मा-सम्बंधी अनिष्ट-भावना मात्र का सर्वथा न रहना मोक्ष है। कुछ लोग कर्म को मोक्ष का उपाय कहते हैं जिसका अभिप्राय निकलता है की उक्त भावनानिवृत्ति वे कर्म से मानते हैं । अन्य लोग पंचाग्नि तपना आदि तपस्या को साधन कहते हैं। कुएँ खुदवाना आदि समाज सेवा के कर्मों को भी कई लोग मोक्ष का हेतु बताते है। अन्य लोग दान को व कुछ लोग व्रतों को मोक्षोपाय समझाते हैं। कुछ को तीर्थों में स्नान करना और अन्यों को तीर्थों में वास करना मोक्ष का कारण लगता है। यमादि आठ अंगों वाले योग को भी लोग मोक्षसाधन मानते हैं। कई तो कहते हैं कि उपनिषद् सुन लेने से ही मोक्ष हो जाता है। दूसरों की मान्यता है कि उपनिषद् सुनकर पता लगे अर्थ का युक्तियों से विचार करना ही मोक्ष के लिए पर्याप्त है। कुछेक लोग तो मूर्तियों की उपासना को मोक्ष का हेतु कहते हैं। अन्यों के अनुसार सत्पुरुषों की संगति से मोक्ष मिलता है। कहाँ तक गिनायें! संसार में मुँह तो अनंत हैं और जितने मुँह उतनी बातें भी हैं। इन सब साधनों का अनुष्ठान करके भी कई लोग फिर गर्भवास भोगने को मजबूर होते हैं और कई मुनि ऐसे भी हैं जो सारी क्रियाएँ छोड़कर भी मुक्त हो जाते हैं। अतः अन्वय-व्यतिरेक से पता चलता है कि उक्त चेष्टाओं से अन्य ही कोई उपाय है जो सारे बंधन छुड़ाता है। उस उपाय का ही नाम है भक्ति। अन्वय माने साथ-साथ रहने का नियम और व्यतिरेक माने उक्त नियम न होना। मोक्ष तभी होता है जब भक्ति हो, बिना भक्ति के मोक्ष कहीं देखा नहीं जाता, यह अन्वय-व्यतिरेक है। एक है बिल्ली की भक्ति और एक है बंदर की भक्ति। कभी की जाये, कभी न भी की जाये तो बिल्ली की भक्ति कही जाती है। जैसे बिल्ली कभी अपने बच्चे को मुंह में पकड़कर इधर-उधर ले जाती है और कभी उसे छोड़कर घूम आती है। लेकिन बंदर का बच्चा अपनी माँ से चिपटा ही रहता है, उसे छोड़ता नहीं। चाहे बंदरिया पहाड़ों पर, पेड़ों पर कूदती रहे, चाहे जिस संकट में पड़ जाये, उसका बच्चा उससे चिपका ही रहता है, उसे छोड़ता नहीं। ऐसे ही हजारों आफतों के आने पर भी शिव की शरण ही ग्रहण किये रहना बंदर की भक्ति है । इसे उत्तम समझना चाहिए। यही सारे बंधन छुड़ाती है।
भक्ति के तीन स्तर हैं—मंद, मध्यम और उत्तम। मंद भक्ति का मतलब है कि शंभु की कथा सुनने में, उनका नाम-कीर्तन करने में, उन्हें याद करने में कभी-कभी चित्त का प्रेम हुआ करे। मध्यम भक्ति वह वासना अर्थात् प्रेरक संस्कार है जो प्रतिदिन गुरुपूजा, शिवलिंग की अर्चना और शिवभक्तों की वंदना कराती है। इस मध्यम भक्ति से सालोक्यादि फल मिलते हैं। खुद को उपाधि आदि के पराधीन समझना किंकरत्व है जो सभी जीवों में स्वभाविक है। ऐसे किंकरत्व वालों में सिद्ध होने वाले सभी प्रयोजनों को छोडकर महेश्वर में ही निंरतर प्रेम रखना, कोई ऐसा समय या स्थिति न रहे कि बिना प्रेम के रहा जा सके, सर्वरक्षक परमेश्वर को अपने आपका अर्पण कर देना—यह उतम भक्ति कही जाती है।
यह भक्ति नौ तरह की है जिसमें अगली विधा पूर्व विधा से श्रेष्ठ है— (1)शिवविषयक पुराण सुनना, (2) शिवनामों का संकीर्तन करना, (3) शिवध्यान करना, (4) शिवदर्शन करना, (5) शिवपूजन करना, (6) शिव को प्रणाम करना, (7) शिव की दासता स्वीकारना, (8) शिव से मित्रभाव रखना और (9) शिव में अपने आप को अर्पित कर देना।
पशुभूत जीव चाहे जिस तरह की भक्ति वाला हो जाये, यह निश्चय है कि देर-सबेर वह सभी पाशों से छूट ही जायेगा। मंद भक्ति सालोक्य देती है, किन्तु दुर्लभ तो वह उत्तम भक्ति है जिस के बाद गर्भवास की सम्पूर्ण समाप्ति हो जाती है। ब्रह्मा से लेकर क्षुद्रतम प्राणी को जो कोई भी अधिकाधिक आनंद हो सकते हैं, वे सबके सब जहाँ अयत्नलभ्य प्रतीत होते हैं उस मोक्ष का एक ही हेतु है और वह है शिव में भक्ति! इस बात को जो जानता है उसके लिए कह सकते हैं कि इसके पाश कट चुके हैं, क्योंकि वह अपनी जानकारी से अपना फायदा अवश्य ही करेगा। जब तक शिव में मंद भक्ति भी न हो तभी तक किसी अन्य में भक्ति हो सकती है। मध्यम भक्ति आने पर मंद, और उत्तम आने पर मध्यम भी सम्पूर्ण हो जाती है। इसलिए जो मोक्ष चाहें उन्हें चाहिये कि शंकर में उत्तम भक्ति करें। मार्कण्डेय, उपमन्यु, विष्णु, नन्दि, अगत्स्य आदि जो इस योग्य हो चुके हैं कि अब उनका मोक्ष ही होना है, वे भी उत्तम भक्ति का सेवन करते हैं। शिव में उत्तम भक्ति होने तक ही जाति-क्रिया-गुण आदि के निमित्त से भेद का बर्ताव चलता है। यह कोई सत्य नहीं है कि उत्तम भक्ति के बाद भी वैसा बना रहे । जैसे विशेष ढंग से तैयार किये पारे के सम्पर्क से लोहा अपनी प्रकृति छोड़ देता है, वैसे ही शिव भक्ति के प्रभाव से प्राणी अपने जाति आदि के अभिमान को छोड़ देता है। स्वर्ण पर्वत की प्रभा में कौवा भी स्वर्णिम हो जाता है, ऐसे ही देहधारी भी उत्तम भक्ति से स्वयं शिव ही हो जाता है। जीव उत्तम भक्ति के कारण अंतःकरण उपाधि के परिच्छेद छोड़ कर शिव में वैसे ही अभेदेन प्रतिष्ठा पा लेता है जैसे जल सूख जाने पर उसमें पड़ा प्रतिबिम्ब भी नष्ट हो जाता है। जल-स्थानीय उपाधि व प्रतिबिम्ब-स्थानीय प्रतिबंधक जब समूल नष्ट हो जाते हैं तब जो अभी देहधारी लग रहा है वह परंशिव ही रह जाता है।

नैमिषारण्यवासी महर्षियों! यदि इस विषय में आपको कोई संदेह हो तो उसकी निवृत्ति के लिये मैं यह शिव भक्ति का चरित्र सुनाता हूँ। उपमन्यु महामुनि ने इसका उपदेश दिया था। भक्तों की महत्ता बताने वाले इस उत्तम पुराण को सुनकर आप के सभी संशय मिट जायेंगे। मुनियों ने प्रार्थना की— हे सूत जी! भक्तों का महात्म्य बताने वाला वह श्रेष्ठ पुराण सुनाइये जिसे सुनकर ये जाति आदि अभिमान बाधित हो जाते हैं।
सूत जी ने कहना प्रारंभ किया— कलियुग में वेद लुप्त हो गये। अतः याग भी संभव नहीं रहे। योगाभ्यास तो और भी मुश्किल हो गया। गुरु-शिष्य की परंपरा भी रह नहीं गयी। यह सब देखकर सभी प्राणियों पर दया करने वाले मुनीश्वर हरभक्त ने उपमन्यु का उपदेश सुन कर भक्त महात्म्य का वर्णन किया है। इसे सुनने से ही शिव में उत्तम भक्ति हो जाती है। उस भक्ति से जीव मृत्यु की परिधि लांघ जाता है, उसका फिर कभी संसरण नहीं होता। शिव ही अपने प्रतिबिम्ब स्थानीय जीव को बनाकर उसके जाति आदि का प्रवर्तन करते हैं और भक्ति का बहाना बनाकर वे ही उसके उन जाति आदि दोषों की निवृत्ति कर देते हैं। दक्षिण देश में क्षीरतरंगिणी नदी के किनारे स्वर्गोपम कांची पुरी है जिस पर भगवान शंकर की ममता है। ब्रह्मादि देवों को व मुनियों को वहाँ तप से सिद्धि मिली है। जग-जननी कामाक्षी देवी वहीं पराकाश में देदीप्यमान हैं। भगवान सदाशिव उसी पुरी में काम्रेश्वर रूप से तप करते हुए वेद के मूल में विद्यमान हैं। वसिष्ठ आदि मुनियों ने वहाँ कामाक्षीपति को तपस्या से प्रसन्न किया है।

एक समय की बात है— मलयाचल-निवासी तथा लोपामुद्रा के पति, महायोगी अगस्त्य उस शक्तिक्षेत्र में आये। मुनियों ने उनकी पूजा कर उनसे निवेदन किया— ‘हे भगवन्! आप सब जानते हैं, करुणानिधि हैं। हम लोगों ने बहुत समय तक तप भी किया, सैकड़ों यज्ञ किये, महादेव की अर्चना भी की, फिर भी हमारा चित्त शुद्ध नहीं हो रहा। विषयों की आशा रूप धूल से धूसरित हमारा यह मन निंरतर अस्थिर बना रहता है। हमारी मुक्ति कैसे होगी, यह बताने की कृपा करें।

अगस्त जी ने मुनियों से यह कहा— सबके अंदर स्थित महेश्वर की उत्तम भक्ति के बिना सैकडों कल्प बीतने पर भी मानवों को मोक्ष मिल नहीं सकता। इस आकाश को चमडे की तरह लपेट लेना जैसे असंभव है वैसे ही शंभु-भक्ति के बिना शोक का पूर्ण समापन असंभव है। बाकी सभी कुछ छोड्कर सिर्फ शंभु की दासता प्राप्त होना वह भक्ति है जो शोक-समापिका है। यह उसी जन्म से मिलती है जिसमें मोक्ष- लाभ की योग्यता आ चुकी हो। सर्वज्ञ कार्तिक स्वामी ने इस सन्दर्भ में जो कहा था वह सुनाता हूँ। यह सुनने मात्र से ही पाशों से मोक्ष हो जाता है। हर तरह के सौन्दर्य से भरपूर कैलास पर श्रीमद्भोगवतीपुर नामक स्थान है। एक बार वहाँ रत्नजटित स्वर्ण सिंहासन पर शिव-पार्वती विराजमान थे। आदित्य, मरुत्, देव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, सनकादि मुनि, रंभादि अप्सरायें, इंद्रादि लोकपाल एवं अन्य देवयोनियों वाले शिवगण सेवा में उपस्थित थे। भक्तिपूर्वक कोई गा रहे थे, कुछ प्रणाम कर रहे थे, कुछ स्तुति कर रहे थे। अन्य कुछ नाच रहे थे व बाजे बजा रहे थे। शौनकादि मुनियों से घिरे महामुनि उपमन्यु भी महादेव के सिहांसन के पास उपस्थित थे। उस समय करोड़ों सूर्यों के समान एक ज्योति आकाश में प्रकाशमान हुई जिस पर सबकी दृष्टि अवश्य पड़ी। उसे देख शौनकादि ने उपमन्यु मुनि से पूछा कि यह क्या है? जिन्होंने श्रीकृष्ण को पञ्चाक्षरी विद्या का और आत्मस्वरूप का ज्ञान प्रदान किया था उन महान् तपस्वी मुनि उपमन्यु ने शौनकादि को उत्तर दिया—‘भगवान् शंकर के शाप से ‘सुंदर’ पृथ्वी पर मनुष्य बना, वह उन्हीं की आज्ञा से दक्षिण से कैलास की ओर जा रहा है, उसी की यह चमक है। जिस दिशा में प्रकाश हुआ था उस ओर उपमन्यु ने अंजलि बाँधकर प्रणाम किया। मुनियों ने पूछा कि सब के लिये तो आप आदरणीय हैं, इसे आपने क्यों प्रणाम किया ? उपमन्यु ने कहा कि सुंदर साक्षात् शिव के शरीर से पैदा हुआ है। यह महेश का प्रतिबिम्ब है। उन्ही के शाप से यह भूलोक गया है। वहाँ शिव क्षेत्रों में रहकर द्रविड़ भाषा में भक्तिपूर्वक गीत गाकर यह शिव को प्रसन्न करता है। भक्तिरत्नों के समुद्र स्थानीय त्रेसठ शिवभक्त हुए हैं जो दासभाव अर्थात् उत्तम भक्ति वाले थे। सत्पुत्रभाव, सख्यभाव, दासभाव और ज्ञानभाव, इन चार आचारों वाले इन भक्तों में हुए लेकिन सबको दासभाव वाला इसलिये कहा कि पहले इसे ही उत्तम भक्ति कह चुके हैं।
शेष अगले अंक में-----


 
------------------------------------------------------
 
  कार्यक्रम
 
  शिव कथा
    मकर संक्राति
    शिव नाम प्रवचन
    महा शिव रात्रि
READ MORE
 


 

संर्पक

श्री वेदनाथ महादेव मंदिर
एफ / आर - 4 फेस – 1,
अशोक विहार, दिल्ली – 110052
दूरभाष : 09312473725, 09873702316,
011-47091354


 


  प्रवचन
 
    प्रवचन 1
    प्रवचन 2
    प्रवचन 3
  प्रवचन 4
 

 

 
Designed and Maintained by Multi Design