उपमन्युकृतं शिवस्तोत्राम्

उपमन्युकृतं शिवस्तोत्राम्

जय शर पार्वतीपते मृड शम्भो शशिखण्डमण्डन।
मदनान्तक भत्तफवत्सल प्रियकैलास दयासुधम्बुध्े।।1।।

हे शर! संसार के कल्याण करने वाले शिव जी, हे पार्वती जगज्जननी के पति–पालकऋ ;अर्थात् भगवती पार्वती इस संसार की माता हैं, और आप उनके पति हैं तो पिफर संसार के पिता हैंद्ध हे मृड–सुख देने वाले, हे शम्भो! हे शशिखण्डमण्डन! अर्थात् चन्द्रमा की कला से सुशोभित सिर वाले, हे मदनान्तक! काम को भस्म करने वाले, हे भत्तफवत्सल! हे प्रियकैलास! अर्थात् कैलासवास को पसन्द करने वाले, हे दयासुधम्बुध्े! दया के सागर, आपकी जय हो अर्थात् आप सर्वोत्कृष्ट हैं, आपको नमस्कार है। ;यहाँ भत्तफ का भगवान् के प्रति अपकृष्ट होना अर्थात् सि( है, अत: व्य नावृत्ति से नमस्कार अभिव्यत्तफ होता है।

सदुपायकथास्वपण्डितो हृदये दु:खशरेण खण्डित:।
शशिखण्डमण्डनं शरणं यामि शरण्यमीरम्।।2।।

हे शम्भो! मेरा हृदय दु:ख रूपीबाण से पीडित है, और मैं इस दु:ख को दूर करने वाले किसी उत्तम उपाय को भी नहीं जानता हूँ अतएव चन्द्रकला व शिखण्ड मयूरपिच्छ का आभूषण बनाने वाले, शरणागत के रक्षक परमेश्वर आपकी शरण में हूँ। अर्थात् आप ही मुझे इस भयंकर संसार के दु:ख से दूर करें।

महत: परित: प्रसर्पतस्तमसो दर्शनभेदिनो भिदे।
दिननाथ इव स्वतेजसा हृदयव्योम्नि मनागुदेहि न:।।3।।

हे शम्भो हमारे हृदय आकाश में, आप सूर्य की तरह अपने तेज से चारों ओर घिरे हुए, ज्ञानदृष्टि को रोकने वाले, इस अज्ञानान्ध्कार को दूर करने के लिए प्रकट हो जाओ। ;सूर्य जिस प्रकार अपने तेज–प्रकाश से रात्रिा जन्य अन्ध्कार को दूर कर देता है, उसी प्रकार आप भी यदि हमारे हृदय में प्रकट रहेंगे अर्थात् हमारे यान में रहेंगे तो जरूर हमारा भी कुछ न कुछ अज्ञानान्ध्कार दूर हो जायेगाद्ध।

न वयं तव चर्मचक्षुषा पदवीमप्युपवीक्षितुं क्षमा:।
कृपयाभयदेन चक्षुषा सकलेनेश विलोकयाशु न:।।4।।

हे ईश! हम इन चर्मचक्षु अर्थात् स्थूल नेत्राों से ;तुम्हारे धम तक पहुँचने वालेद्ध रास्ते को भी नहीं देख सकते हैं, अत: कृपा करके आप प्राणियों को अभय प्रदान करने वाले अपनी दयादृष्टि से हमें अच्छी तरह शीघ्र देखें। तात्पर्य यह है कि जब हम अपनी स्थूल दृष्टि ;सीध्े सीध्े विचारोंद्ध से आपके दर्शन कराने वाले मार्ग तक को नहीं देख सकते, तब साक्षात् दर्शन कैसे कर सकते हैं, अत: हे भगवन्! आप हमें अपनी कृपाभरी पूरी निगाहों से इस प्रकार देखें कि जिससे हमारे में आपके दर्शन करने की क्षमता आ जाय।

त्वदनुस्मृतिरेव पावनी स्तुतियुत्तफा न हि वत्तफुमीश सा।
मध्ुरं हि पय: स्वभावतो ननु कीक् सितशर्करान्वितम्।।5।।

हे ईश! आपका स्मरण ही परम पवित्रा है, तब स्तुतिरूप में या प्रशंसात्मक व्याख्यान में उसको क्या कहा जा सकता है? क्योंकि दूध् स्वभाव से ही मीठा हैऋ यदि उसमें चीनी डाल दी जाय तो पिफर कहना ही क्या? तात्पर्य यह है कि आपके स्मरण कीर्तन व यान से ही जब इतना आनन्द मिलता है, तो पिफर प्रशंसात्मक पद्यों के द्वारा स्तुति के द्वारा या कविता के रूप में कहा गया, आपके गुणों का गान कितना आनन्द प्रदान नहीं करेगा, यह कहा नहीं जा सकता है। स्वभावत: मध्ुर दूध् में चीनी डाल देने से, जिस प्रकार उसका माध्ुर्य बढ़ जाता है इसी प्रकार अच्छे शब्दों में कीखतत भगवाम भी अध्कि आनन्द प्रदान करता है। अथवा आपके स्वरूप का प्रतिपादन तो वाणी का विषय नहीं है, यदि वह किसी भी वाणी का विषय होता तो पिफर उस से कितना आनन्द आता, यह भी इस पद्य का रहस्य है।

सविषोप्यमृतायते भवाछवमुण्डाभरणोपि पावन:।
भव एव भवान्तक: सतां समदृखिवषमेक्षणोपि सन्।।6।।

हे शम्भो! आप विषसहित होते हुए भी अमृत के समान हैं, शवों के मुण्डों से सुशोभित होते हुए भी पवित्रा हैं। स्वयं ;जगत् के उत्पादकद्ध भव होते हुए भी, सज्जनों के या सन्तों के ;सांसारिक बन्ध्नद्ध को दूर करने वाले हैं। विषमनेत्रा अर्थात् तीन नेत्रा ;सूर्य, अग्नि, चन्द्र नेत्राद्ध वाले होते हुए भी समदृष्टि अर्थात् पक्षपात रहित हैं।

अपि शूलध्रो निरामयो दृढवैराग्यरतोपि रागवान्।
अपि भैक्ष्यचरो महेररितं चित्रामिदं हि ते प्रभो।।7।।

हे प्रभो! आप शूलध्र–त्रिाशूल को धरण करने वाले, ;शूल–रोग विशेष से युत्तफद्ध होते हुए भी, निरामय–नीरोग हो अर्थात् आप संसार के जन्म जरा मरणादि रोगों से अथवा आयात्मिक, आध्दिैविक और आध्भिौतिकादि द्वन्दों से दूर हैं। दृढवैराग्य से युत्तफ होते हुए भी रागवाले हो, अर्थात् भत्तफों के अनु नात्मक राग से युत्तफ हो। इसीलिए जल्दी प्रस हो जाते हो अत: सरस हो, अन्यथा कठोर दिलवाले का तो जल्दी प्रस होना मुशिकल है। अथवा ‘राग’ यह भी आनन्द की ही अन्यतम मात्राा है जिससे आप भत्तफों को संतुष्ट करते हैं। भगवान् शर को आशुतोष कहने का कदाचिद् यही रहस्य हो। स्वयं भिक्षावृत्ति वाले होते हुए भी महान् ऐश्वर्य सम्प आप है, आपका यह ;विरोधभासात्मकद्ध जो चरित है, वह बड़ा ही आ र्यजनक है।

वितरत्यभिवाछितं दृशा परिदृ: किल कल्पपादप:।
हृदये स्मृत एव ध्ीमते नमतेभीपफलप्रदो भवान्।।8।।

कल्पवृक्ष तो आँखों से देखे जाने पर ही किसी मनोवाछित वस्तु को प्रदान करता है, परन्तु आप तो केवल हृदय में स्मरण से ही नमस्कार करने वाले सद्विचारसंप जन के लिए अभीष्ट पफल प्रदान करते हैं।

सहसैव भुजपाश्वान् विनिगृाति न यावदन्तक:।
अभयं कुरु तावदाशु मे गतजीवस्य पुन: किमौषध्ै:।।9।।

भुज के समान भयंकर पाशवाला यमराज, जब तक अकस्मात् ;मुझेद्ध ग्रहण नहीं कर लेता है, अर्थात् मेरे प्राणों का हरण नहीं कर लेता है, तब तक जल्दी ही मेरे लिए आप अभयदान दें, अर्थात् मोक्ष प्रदान करें। नहीं तो पिफर जीवन समाप्त होने के बाद तो, औषधि् से भी कुछ बनने का नहीं।

सविषैरिव भोगपगैखवषयैरेभिरलं परिक्षतम्।
अमृतैरिव संभ्रमेण मामभिषिाशु दयावलोकनै:।।10।।

विषधरी भारी साँपों के समान इन सांसारिक विषयों ने मुझे भयभीत कर रखा है, अत: इनसे मैं परेशान हूँ। कृपया अमृत के समान ;जीवनदायक अथवा मुत्तिफसाध्कद्ध अपने कृपाकटाक्षों के अवलोकन से मुझे बचाइए।

मुनयो बहवोद्य ध्न्यतां गमिता: स्वाभिमतार्थदखशन:।
करुणाकर येन तेन मामवसं ननु पश्य चक्षुषा।।11।।

हे करुणानिधन! अपने अपने अभी अर्थ ;प्रयोजनद्ध को देखने वाले बहुत से मुनियों को अपने अपने जिस कृपावलोकन ;दयादृद्धि के द्वारा ध्न्यता पूर्ण बनाया, ;पिफरद्ध आज अवस नाश को प्राप्त हुए मुझको भी, उसी कृपापूर्ण दृि से निि त देखिए।

प्रणमाम्यथ यामि चापरं शरणं कं कृपणाभयप्रदम्।
विरहीव विभो प्रियामयं परिपश्यामि भवन्मयं जगत्।।12।।

हे प्रभो! अब मैं आपको प्रणाम करता हूँ, और आपकी शरण लेता हूँ। दीनों को अभयदान देने वाले आपको छोड़कर और ;अन्यद्ध किसकी शरण में मैं जाऊँ? कोई विरही जिस प्रकार सारे संसार को प्रियामय देखता है, हे विभो! उसी प्रकार मैं भी ;आपके विरह मेंद्ध इस समस्त चराचर जगत् को आपमय अर्थात् शिवमय देखता हूँ। जैसे कोई रागी अपनी प्रिया में अत्यन्त आसत्तफ होता है, अन्य किसी पदार्थ में उसी रुचि नहीं होती है, कहने का तात्पर्य यह है कि संसार में उसके लिए प्रिया से उत्कृ वस्तु पिफर कोई नहीं है, दर्शन की भाषा में हम जिसे ‘प्रियाद्वैत’ भी कह सकते हैंऋ इसी प्रकार शिवभत्तफ भी जब शिव को ही परमप्रेमास्पद मानता है, एक क्षण भी उससे अपने को विमुत्तफ नहीं होना चाहता है, तो उसके लिए भी पिफर यह संसार तो नहीं के समान है, अर्थात् सर्वत्रा ‘शिवाद्वैत’ भावना हीं है।

बहवो भवतानुकम्पिता: किमितीशान न मानकम्पसे।
दध्ता किमु मन्दराचलं परमाणु: कमठेन दुध्‍र्र:।।13।।

हे शम्भो! आपने बहुतों के ऊपर अनुकम्पा की है, पिफर क्यों आप मेरे ऊपर अनुकम्पा नहीं करते हैं? जो कमठ–कच्छुवा अपनी पीठ पर इतने बडे़ मन्दराचल को धरण कर सकता है, तो पिफर वह एक परमाणु को धरण नहीं कर सकता क्या?
अर्थात् जिस प्रकार बहुत बडे़ मन्दराचल को धरण करने वाले कमठ के लिए परमाणु धरण करना कोई कठिन नहीं है, इसी प्रकार इतने बडे़ संसार का उ(ार करने वाले आपके लिए भी, परमाणु तुल्य मेरा उ(ार करना भी आसान है।

अशुच यदि मानुमन्यसे किमिदं मूखन कपालदाम ते।
उत शाठ्यमसाध्ुसनिं विषलक्ष्मासि न क द्विजिध्ृक्।।14।।

;भत्तफ अपने प्रभु को इस पद्य में उलाहना देकर कह रहा है किद्ध– हे विभो! यदि आप मनुष्य होने के नाते मुझे अपवित्रा समझते हैं, तो पिफर आपने अपने मस्तक में नरकपालों की यह अपवित्रा माला कैसे पहन ली, क्या यह अपवित्रा नहीं है? अथवा दुों के साथ रहने से मुझे शठ समझकर मेरा उ(ार नहीं कर रहे हैं, मेरी उपेक्षा कर रहे हैं, तो पिफर आप द्विजिध्ृक साँप को धरण करके अथवा द्विजिध्ृक चुगलखोर को साथ में रखकर ‘शठ’ अथवा अलक्षण या कुलक्षण वाले नहीं है क्या?

दृशं विदधमि क करोम्यनुतिशमि कथं भयाकुल:।
नु तिश्सि रक्ष रक्ष मामयि शम्भो शरणागतोस्मि ते।।15।।

हे शम्भो! मैं अब किध्र देखूँ ;दृि लगाऊँद्ध क्या करूँ, भयभीत मैं कैसे यहां रहूँ? हे प्रभो! आप कहाँ हैं? मेरी रक्षा करें। मैं ;अबद्ध आपकी हीं शरण में हूँ।

विलुठाम्यवनौ किमाकुल: किमुरो हन्मि शिरश्छिनि वा।
किमु रोदिमि रारटीमि क कृपणं मां न यदीक्षसे प्रभो।।16।।

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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं।

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