शिवभक्ति की प्रंशसा

श्री गणेश जी की मैं वन्दना करता हूं ताकि मेरा मनोरथ निर्विघ्न पूर्ण हो। मैं शिव-पार्वती की गोद में खेलते कार्तिक स्वामी की उपासना करता हूं। वासना-अंधकार कानिवारण करने वाले शिवभक्तों की चरणधूलि को मेरा सदा प्रणाम है। श्रीपति ,ब्रह्मा ,सूर्य, स्कन्द, इन्द्रादि देवों की और उपमन्यु आदि मुनियों की मैं हमेशा वन्दना करता हूं।
नैमिषारण्य में मुनियों ने अठारहों पुराणों के जानकार सूत जी से कहा—हे सूत जी! आप महामति हैं, व्यासजी के शिष्य हैं, सभी पुराणों को जानते हैं। हम अपने संदेह को मिटाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात आपसे पूछ्ते हैं। वेद, आगम, मन्त्र, कर्मबोधक-वाक्य और महावाक्य इनका चरम तात्पर्य क्या है? संसरण का कारण क्या है? वेदान्त का विचार कर लेने पर और उसका अर्थ समझ लेने पर भी कर्म-बंधन चलता ही क्यों रहता है, छूटता क्यों नहीं? यह सब आप विस्तार से बताइये।

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Shiv Yogi Asram

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भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं। मैं ही सब कुछ हूं। मुझ से अलग किसी का वजूद ही नहीं है। मेरे गुण तर्क से परे हैं। मैं नित्य स्वरूपा एवं कार्य कारण रूपिणी हूं।’ स्पष्ट है कि विविध पुराणों में विशुद्ध रूप से वर्णित शिव-शक्ति समस्त चराचर के लिए मंगलकारी और कल्याणकारी यानी शुभ है।

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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं।

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